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ग़ज़ल
क्यूँ कुश्त-ए-ए'तिबार भी सरसर की ज़द में हो
क्या इंतिज़ार-ए-ख़ुल्क़ से फ़स्ल-ए-हुनर कटे
अता शाद
ग़ज़ल
कुश्त-गान-ए-ख़ंजर-ए-तस्लीम कहलाते हैं क्यूँ
कुछ तड़प दिखलाइए कुछ बे-क़रारी कीजिए
मिद्हत-उल-अख़्तर
नज़्म
ना-गुज़ीर
ये कुश्त-ओ-ख़ून ये ग़ारत-गरी ये बर्बादी
हवा-ओ-हिर्स-ओ-मज़ालिम की दास्तान-ए-तवील
होश जौनपुरी
कुल्लियात
क्या जुर्म था किसू पे न मा'लूम कुछ हुआ
जो 'मीर' कुश्त-ओ-ख़ूँ का सज़ा-वार हो गया
मीर तक़ी मीर
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रेख़्ता शब्दकोश
KHushuu'
ख़ुशू' خُشُوع
नम्रता, विनय, आजिज़ी, किसी के सामने भय और विस्मय के साथ खड़े रहना, विनम्र होना, गिड़गिड़ाना (आमतौर पर ख़ुज़ू' (विनम्रता) के साथ)
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ग़ज़ल
बशीर दादा
ग़ज़ल
सहरा-ए-नीम-शब में बे-आस रेतों पर
दिन भर के कुश्त ओ ख़ूँ का मारा तड़प रहा है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
कुल्लियात
क्या मुत्तक़ी था 'मीर' पर आईन-ए-‘इश्क़ में
मुजरिम सा कुश्त-ओ-ख़ूँ का सज़ा-वार हो गया
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
फल है ये 'मीर' इश्क़ का उस नौ-बहार के
आख़िर जो कुश्त-ओ-ख़ूँ के सज़ा-वार हम हुए
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
वो कुश्त-ओ-ख़ूँ वो तशद्दुद तो इक बहाना था
उसे तो सिर्फ़ मिरा ज़र्फ़ आज़माना था
रहबर ताबानी दरियाबादी
ग़ज़ल
न आई याद तेरी ये भी मौसम का तग़य्युर था
ये कुश्त-ए-शौक़ थी परवर्दा-हा-ए-बाद-ओ-बाराँ भी


