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ग़ज़ल
लगा के लासे पे ले के आया हूँ शैख़ साहब को मय-कदे तक
अगर ये दो घोंट आज पी लें मिलेगा मुझ को सवाब आधा
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
अहमद फ़राज़
नज़्म
शिकवा
बादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठे
सुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठे
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
तन्हाई
ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार
लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है


