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दुआ (मुनाजात)
मता'-ए-लफ़्ज़-ओ-म'आनी को अंगबीं कर दे
मिरे ख़ुदा मिरी ग़ज़लों को दिल-नशीं कर दे
हलीम हाज़िक़
शेर
पेच दे दे लफ़्ज़ ओ मअनी को बनाते हैं कुलफ़्त
और वो फिर उस पे रखते हैं गुमान-ए-रेख़्ता
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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नज़्म
अलिफ़ लफ़्ज़ ओ मआनी से मुबर्रा
अलिफ़ लफ़्ज़ ओ मआनी से मुबर्रा
अलिफ़ तंहाई का रौशन हयूला
आदिल मंसूरी
ग़ज़ल
लफ़्ज़-ओ-मा'नी के समुंदर का सफ़र हैं कुछ लोग
यार इस दौर में भी अहल-ए-नज़र हैं कुछ लोग
शम्स रम्ज़ी
ग़ज़ल
बराए-दिलकशी लफ़्ज़-ओ-मआ'नी माँग लेता है
क़लम से रोज़ काग़ज़ इक कहानी माँग लेता है
अनवर कमाल अनवर
अप्रचलित ग़ज़लें
بقدر لفظ و معنی فکرت احرام گریباں ہیں
وگر نہ کیجیے جو ذرہ عریاں ہم نمایاں ہیں
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
लफ़्ज़-ओ-मा'नी की ये सब झूटी नुमाइश छोड़ दे
यूँ हमा-दानी की नादाँ अपनी ख़्वाहिश छोड़ दे
हफीज़ बेताब
ग़ज़ल
लफ़्ज़-ओ-मा'नी की जिहत पर नहीं छोड़ा मैं ने
शे'र यक सत्ही परत पर नहीं छोड़ा मैं ने
दिलावर अली आज़र
ग़ज़ल
लफ़्ज़-ओ-मा'नी क्या हैं हर्फ़-ओ-सौत की दुनिया है क्या
दिल ने समझाया था क्या और 'अक़्ल ने समझा है क्या


