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ग़ज़ल
अपनी नज़रों में तो मेरा ज़ो'म-ए-हस्ती लग़्व है
किस से पूछूँ अपनी सच्चाई किसे आवाज़ दूँ
बलराज हयात
शायरी के अनुवाद
है ‘अर्श-नशीनों के लिए लग़्व हिकायत
ये क़हर-ज़दा लोग जो फ़रियाद-कुनाँ हैं
लॉर्ड टेनीसन
नज़्म
इल्म-ओ-ख़ुदी
जो इल्म तुझे पास-ए-ख़ुदी पर न उभारे
वो लग़्व है या लह्व है या सहव है प्यारे
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो
मोमिन ख़ाँ मोमिन
नज़्म
मुझ से पहले
मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
अहमद फ़राज़
नज़्म
कभी कभी
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले