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नज़्म
अहसन तक़्वीम
ऐवान-ए-ज़र-ओ-सीम में महशर हुआ बरपा
ख़ाइफ़ हमा-तन लश्कर-ए-शद्दाद है हम से
बेबाक भोजपुरी
ग़ज़ल
देखा गया न मुझ से मआनी का क़त्ल-ए-आम
चुप-चाप मैं ही लफ़्ज़ों के लश्कर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बहुत नाज़ुक हैं मेरे सर्व क़ामत तेग़ज़न लोगो
हज़ीमत ख़ुर्दगी मेरी सफ़-ए-लश्कर पे लिख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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ग़ज़ल
है काएनात-ए-अज़्मत-ए-शद्दाद जल्वा-गर
इंसानियत सिसकती है हर गाम पर अभी
क़ाज़ी सय्यद ख़ुर्शीदुद्दीन ख़ुर्शीद
ग़ज़ल
ख़ाक-नशीनों से कूचे के क्या क्या नख़वत करते हैं
जानाँ जान तिरे दरबाँ तो फ़िरऔन-ओ-शद्दाद हुए
जौन एलिया
नज़्म
हक़-केश की फ़रियाद
ग़ाज़ी ने कहा लूट लो बुत-ख़ाना-ए-दौलत
सूफ़ी ने कहा छोड़ दो इशरत गह-ए-शद्दाद
बेबाक भोजपुरी
ग़ज़ल
लश्कर-ए-क़ल्ब-ए-सफ़-ए-उश्शाक़ में है ग़लग़ला
यक्का-ताज़-ए-आह कूँ किस ने किया है ना-रसीद
सिराज औरंगाबादी
नज़्म
और हवा चुप रही
ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा
और हवा चुप रही
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
अना और मोहब्बत
वो साहिरा कि लश्कर-ए-जमाल-ए-बा-कमाल उस के साथ था
वो साहिरा कि क़त्ल-ए-आम के तमाम असलहों से लैस थी
ख़ालिद मुबश्शिर
नज़्म
दूर बहुत दूर इंसान शाहराह-ए-इर्तिक़ा पर
वो जन्नत-ए-शद्दाद हो या आतिश-ए-नमरूद
हर मंज़िल-ए-मौहूम नहीं मंज़िल-ए-मक़्सूद
मुसतफ़ा राही
ग़ज़ल
कहते हैं ज़ुल्म के ब'अद आह करोगे तो क्या
लश्कर-ए-जौर-ओ-जफ़ा में ये अलम और सही