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ग़ज़ल
'रशीद'-ए-ज़ार क्यूँ ख़ुश ख़ुश न जाए क़ब्र की जानिब
मयस्सर आज दीदार-ए-शह-ए-लौलाक होता है
रशीद लखनवी
ग़ज़ल
निस्बत-ए-ख़ाक पे शर्मिंदगी क्यों हो मुझ को
दस्तकें देती है जा कर दर-ए-लौलाक पे ख़ाक
तबस्सुम सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
बंदा-ए-'नाज़िर' भी हाज़िर तेरे मय-ख़्वारों में हो
ऐ शह-ए-लौलाक जब तू साक़ी-ए-कौसर बने


