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ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुझी को ये सफ़्फ़ाकी-ए-हुनर भी मिली
इक एक लफ़्ज़ को यूँ बे-लिबास कर जाना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
जहाँ 'रेहाना' रहती थी
मिरे जज़्बात की देवी मिरे अशआर की मलका
वो मलका जो ब-रंग-ए-अज़्मत-ए-शाहाना रहती थी
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
ब-अंदाज़-ए-ख़ुदायाना ब-वस्फ़-ए-शान-ए-शाहाना
इशारों पर किसी के मुनहसिर हर काम होता है
बिशन दयाल शाद देहलवी
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नज़्म
पदमनी
रौनक़-ए-ख़ल्वत-ए-शाहाना बनाया तुझ को
नाज़िश-ए-हिमात-ए-मर्दाना बनाया तुझ को
सुरूर जहानाबादी
ग़ज़ल
राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव
आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम