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ग़ज़ल
'फ़ज़ा' तुझी को ये सफ़्फ़ाकी-ए-हुनर भी मिली
इक एक लफ़्ज़ को यूँ बे-लिबास कर जाना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
जहाँ 'रेहाना' रहती थी
वो मलका जो ब-रंग-ए-अज़्मत-ए-शाहाना रहती थी
यही वादी है वो हमदम जहाँ रेहाना रहती थी
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
ब-अंदाज़-ए-ख़ुदायाना ब-वस्फ़-ए-शान-ए-शाहाना
इशारों पर किसी के मुनहसिर हर काम होता है
बिशन दयाल शाद देहलवी
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नज़्म
पदमनी
रौनक़-ए-ख़ल्वत-ए-शाहाना बनाया तुझ को
नाज़िश-ए-हिमात-ए-मर्दाना बनाया तुझ को
सुरूर जहानाबादी
ग़ज़ल
राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव
आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
नज़र आता है मुझ को बोरिया भी तख़्त-ए-ताऊसी
गदा रखता है गोया शौकत-ए-शाहाना मस्ती में
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
पिन्हाने को कफ़न अहबाब लाते हैं ज़हे क़िस्मत
मुबारक ऐ अजल अब ख़िलअत-ए-शाहाना आता है
सफ़दर मिर्ज़ापुरी
शेर
न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना
मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना
मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना