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ग़ज़ल
दिल तो इन पाँव पे लोटे है मिरा वक़्त-ए-ख़िराम
शब को दुज़दी से भी पर उन को दबा सकते नहीं
जुरअत क़लंदर बख़्श
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ग़ज़ल
दिल उस का न लोटे कभी फूलों की सफ़ा पर
शबनम को दिखा दूँ जो तिरे गात का आलम
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
नज़्म
पाक ओ हिन्द यक-जेहती
कँवारा आदमी हो या कोई आज़ाद लीडर हो
जो बे-पेंदे के लोटे हैं वो सारे एक जैसे हैं
खालिद इरफ़ान
नज़्म
ईद का मेला
तर हलवा गर्म कड़ाही में दो लोटे हैं इक ठेला है
यारो ये ईद का मेला है
सय्यद ज़मीर जाफ़री
ग़ज़ल
लोटते हैं जिस को सुन सुन कर हज़ारों मुर्ग़-ए-दिल
हो रहा है ज़िक्र किस के गेसुओं के दाम का
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
ग़ज़ल
लोटते हैं मस्त मय-ख़ाने के दर पर जा-ब-जा
जाम ओ सहबा साक़ी ओ पीर-ए-मुग़ाँ को इश्क़ है

