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ग़ज़ल
'इश्क़ रहज़न न सही 'इश्क़ के हाथों फिर भी
हम ने लुटती हुई देखी हैं बरातें अक्सर
जाँ निसार अख़्तर
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ग़ज़ल
यूँ न लुटी थी गलियों दौलत अपने अश्कों की
रोते हैं तो हम को अपने ग़म-ख़ाने याद आते हैं
हबीब जालिब
ग़ज़ल
मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता
न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
जुदाई
वो भैरवीं तिरी बेदारियों की गाई हुई
वो मुस्कुराती हुई लुत्फ़-ए-दीद की सुब्हें
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
एज़ाज़ अहमद आज़र
नज़्म
साल-ए-नौ मुबारक
अँधेरों ने लूटी उजालों की दौलत
उड़ा ले गया वक़्त इक ख़्वाब-ए-राहत




