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ग़ज़ल
कभी मैं जुरअत-ए-इज़हार-ए-मुद्दआ तो करूँ
कोई जवाज़ तो हो लुतफ़-ए-बेसबब के लिए
सय्यद आबिद अली आबिद
शेर
कभी मैं जुरअत-ए-इज़हार-ए-मुद्दआ तो करूँ
कोई जवाज़ तो हो लुत्फ़-ए-बे-सबब के लिए
सय्यद आबिद अली आबिद
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कुल्लियात
तल्ख़ उस का तो शहद-ओ-शकर है ज़ौक़ में हम नाकामों के
लोगों में लेकिन पोच कहा ये लुत्फ़-ए-बे-हंगाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जो मज़ा है तिश्नगी में है जो लुत्फ़-ए-बे-क़रारी
तुझे क्या बताऊँ हमदम तिरा दिल जला नहीं है
हैरत फ़र्रुख़ाबादी
ग़ज़ल
रवानी-हा-ए-मौज-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल से टपकता है
कि लुत्फ़-ए-बे-तहाशा-रफ़्तन-ए-क़ातिल-पसंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
उस को इनआम-ए-ख़ुदी और इस पर लुत्फ़-ए-बे-ख़ुदी
वो करम करते हैं ज़र्फ़-ए-अहल-ए-इरफ़ाँ देख कर
फ़ानी बदायुनी
ग़ज़ल
सरमाया-ए-हयात है वो लुत्फ़-ए-बे-पनाह
बज़्म-ए-जहाँ में दिल से लगाया गया मुझे