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ग़ज़ल
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
किसी के लुत्फ़-ए-कम को देर लगती है सिवा होते
चटकने तक तो हर गुल की जिबिल्लत इंफ़िआ'ली है
गौहर होशियारपुरी
ग़ज़ल
अमर रूहानी
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ग़ज़ल
मोहब्बत है ख़याल-ए-ख़ाम लेकिन तेरे दीवाने
जुनूँ में रात दिन लुत्फ़-ए-ख़याल-ए-ख़ाम लेते हैं
मंज़ूर हसन नामी
ग़ज़ल
ज़ंजीर-ए-मोहब्बत की असीरी में है क्या लुत्फ़
पेच-ओ-ख़म-ए-काकुल के गिरफ़्तार से पूछो
माहिर बिलग्रामी
शेर
खुल गया अब ये कि वस्ल उस का ख़याल-ए-ख़ाम है
आज उम्मीदों का दिल ही दिल में क़त्ल-ए-आम है
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
असर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुल
नवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
लुत्फ़-ए-य-कजुरआ से ऐसे में बनेगा क्या काम
दौर-अव्वल में तो हम रत्ल-ए-गिराँ चाहते हैं
मोहम्मद आज़म
ग़ज़ल
ये याद-ए-लुत्फ़-ए-बहाराँ भी कम नहीं है 'हबीब'
भरी ख़िज़ाँ में भी क्या हम ख़िज़ाँ की बात करें
जयकृष्ण चौधरी हबीब
शेर
पैग़ाम-ए-लुत्फ़-ए-ख़ास सुनाना बसंत का
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-आम बहाना बसंत का