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नज़्म
एक शौहर का तआ'रुफ़
वो सितम-ईजाद है वो बानी-ए-बे-दाद है
हसरतों का ख़ून करता है बड़ा जल्लाद है
मंझू बेगम लखनवी
ग़ज़ल
निकोहिश है सज़ा फ़रियादी-ए-बे-दाद-ए-दिलबर की
मबादा ख़ंदा-ए-दंदाँ-नुमा हो सुब्ह महशर की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दिल में उस बानी-ए-बे-दाद के घर होने दो
रफ़्ता-रफ़्ता मिरी आहों का असर होने दो
मुंशी शिव परशाद वहबी
ग़ज़ल
वो इल्तिमास-ए-लज्ज़त-ए-बे-दाद हूँ कि मैं
तेग़-ए-सितम को पुश्त-ए-ख़म-ए-इल्तिजा करूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ख़ुम कहीं साग़र कहीं मुतरिब कहीं 'सहबा' कहीं
कौन है जो माइल-ए-बे-पर्दा-दार-ए-नग़्मा है
सहबा लखनवी
नज़्म
हम
ज़मीन पे क़ाबील के क़बीले की रस्म-ए-बे-दाद औज पर है
मगर हमारा अज़ाब इस से भी तल्ख़-तर है
ज़िया जालंधरी
ग़ज़ल
दाम का क्या ज़िक्र है मैं बंदा-ए-बे-दाम हूँ
शामत आई फँस गया मुँह देख कर सय्याद का
