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नज़्म
परछाइयाँ
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जोड़े में
साहिर लुधियानवी
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नज़्म
इन्फ्लुएँजा से क्रोना तक
कितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारीं
मगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माओं ने
तहज़ीब हाफ़ी
शेर
सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की
हम्माद नियाज़ी
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
माओं की ग़फ़लत से जब बच्चों को पहुँचेगा गज़ंद
जब फ़ुग़ाँ बे-तर्बियत औलाद की होगी बुलंद




