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ग़ज़ल
क़ल्ब ओ निगाह की ये ईद उफ़ ये मआल-ए-क़ुर्ब-ओ-दीद
चर्ख़ की गर्दिशें तुझे मुझ से छुपा के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
आख़िरी ख़त
अल-क़िस्सा मआल-ए-ग़म-ए-उल्फ़त पे हँसो तुम
या अश्क बहाती रहो फ़रियाद करो तुम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ऐ मेरे सारे लोगो
नारा-ए-हुब्ब-ए-वतन माल-ए-तिजारत की तरह
जिंस-ए-अर्ज़ां की तरह दीन-ए-ख़ुदा की बातें
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
समझती हैं मआल-ए-गुल मगर क्या ज़ोर-ए-फ़ितरत है
सहर होते ही कलियों को तबस्सुम आ ही जाता है




