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नज़्म
फ़र्ज़ करो
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम
नीम-तारीक राहों में मारे गए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
तराना-ए-मिल्ली
ऐ अर्ज़-ए-पाक तेरी हुर्मत पे कट मरे हम
है ख़ूँ तिरी रगों में अब तक रवाँ हमारा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (1)
वो कूज़े मेरे दस्त-ए-चाबुक के पुतले
गिल-ओ-रंग-ओ-रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँ
नून मीम राशिद
ग़ज़ल
ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे




