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नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
हर नस्ल इक फ़स्ल है धरती की आज उगती है कल कटती है
जीवन वो महँगी मदिरा है जो क़तरा क़तरा बटती है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
निर्त पे झूमें भाव पे लहकें मदिरा पी कर बहकें लोग
कौन सुने जो चीख़ें दबी हैं पायल की झंकारों में
इशरत क़ादरी
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नज़्म
नक़्श-ए-फ़र्यादी
हर-वक़्त रहता है मदिरा में असीर
ये मदिरा वो है उस के ज़ेहन में है जो भरी
सलाहुद्दीन परवेज़
नज़्म
प्रीत की होली
उस ने तब मेरे होंटों पर प्यार की मदिरा खोली सखी
अब के बरस फागुन में किसी से ऐसी खेली होली सखी
ज़फ़र संभली
ग़ज़ल
प्यास बहुत है पी लेने दे मदिरा नैन कटोरों से
खोल दरीचे इन पलकों के रौशन ये मधुशाला कर
एहतरामुलहक़ सिद्दीक़ी शरर
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासे
शाह-ए-मर्दां अमीर-ऊल-मोमिनीन हज़रत-'अली' के पोते




