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ग़ज़ल
आँखें न बदलें शोख़-नज़र क्यूँ के अब कि मैं
मफ़्तून-ए-लुत्फ़-ए-नर्गिस-ए-फ़त्ताँ नहीं रहा
मोमिन ख़ाँ मोमिन
शेर
न तो मैं हूर का मफ़्तूँ न परी का आशिक़
ख़ाक के पुतले का है ख़ाक का पुतला आशिक़
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
नज़्म
पंद्रह अगस्त
हो दर्द-ए-दिल में जज़्बा-ए-हुब्ब-ए-वतन फ़ुज़ूँ
'मफ़्तूँ' क़लम उठाओ कि पंद्रह अगस्त है
मफ़तूं कोटवी
ग़ज़ल
करे लब-आश्ना हर्फ़-ए-शिकायत से कहाँ ये दम
तिरे महज़ून-ए-बे-दम में तिरे मफ़्तून-ए-बेकस में
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
घूर लेते थे जफ़ा-कारों को जब मफ़्तूँ न थे
हो गए चौरंग ख़ुद चंगेज़-ख़ानी अब कहाँ
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
न तो मैं हूर का मफ़्तूँ न परी का आशिक़
ख़ाक के पुतले का है ख़ाक का पुतला आशिक़
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
कुल्लियात
नासेह-ए-मुश्फ़िक़ तो कहता था कि उस से मत मिले
पर समझता है हमारा ये दिल-ए-महज़ूँ कहाँ
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
छोड़ कर इश्क़-ए-सनम ज़ाहिद न हो मफ़्तून-ए-हूर
कब यक़ीं लाता है दाना दूर की अफ़्वाह का
हैदर अली आतिश
कुल्लियात
दिल के गए बे-दिल कहलाए आगे देखिए क्या क्या हों
महज़ूँ होवें मफ़्तूँ होवें मजनूँ होवें रुस्वा हों
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जान-ओ-दिल में बे-तरह बिगड़ी है तेरे इश्क़ में
कीजिए दिल की तरफ़ या जान-ए-महज़ूँ की तरफ़
मीर हसन
क़िस्सा
दीवान सिंह मफ़तून
नज़्म
तुम्हारी याद
मक़बरा मेरी तमन्नाओं का माज़ी का हरीम
जिस में मदफ़ून हैं मुर्दे मिरे अफ़्सानों के


