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ग़ज़ल
यूँ बा-ए-फ़त्ह नहीं रहना ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में
महाज़-ए-जंग में पसपाइयाँ भी होती हैं
जावेद अख़्तर आज़ाद
ग़ज़ल
महाज़-ए-जंग पर सीना-सिपर हो कर मैं चलता हूँ
मगर बुज़दिल हमेशा पुश्त पर ही वार करते हैं
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
नज़्म
महारानी लक्ष्मी-बाई
सिपाही थी वो क़ुदरत की तरफ़ से
महाज़-ए-जंग पर यकता थी लक्ष्मी