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ग़ज़ल
महरम-ए-राज़-ए-हरम हूँ वाक़िफ़-ए-बुत-ख़ाना हूँ
मैं रह-ओ-रस्म-ए-मोहब्बत का मगर दीवाना हूँ
करम हैदरी
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ग़ज़ल
नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले
तुम्हें कब देखते हैं कुफ़्र-ओ-ईमाँ देखने वाले
बासित भोपाली
शेर
गरचे है तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पर्दा-दार-ए-राज़-ए-इश्क़
पर हम ऐसे खोए जाते हैं कि वो पा जाए है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ताबिंदा हुस्न-ए-राज़-ए-बहाराँ हमीं से है
नज़्म-ए-ख़िज़ाँ जो है तो हिरासाँ हमीं से है
अर्श सिद्दीक़ी
शेर
ज़ब्त-ए-राज़-ए-ग़म पे सौ जानें भी कर देते निसार
क्या बताएँ बस ज़बाँ पर उन का नाम आ ही गया
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
हया इख़्फ़ा-ए-राज़-ए-दिल की इक तदबीर होती है
नज़र झुकती है वो जिस में कोई तहरीर होती है
अर्शद बिजनौरी
ग़ज़ल
जब तक कि ख़ूब वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहाँ न हूँ
मैं तो सुख़न में इश्क़ के बोलूँ न हाँ न हूँ



