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ग़ज़ल
दे सुबूही जल्द साक़ी अब नहीं माह-ए-सियाम
बे-सबब क्यूँ राह देखें शाम की मय-ख़्वार-ए-सुब्ह
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
अप्रचलित ग़ज़लें
کب فقیروں کو رسائی بت مے خوار کے پاس
تو بتے بو دیجیے میخانے کی دیوار کے پاس
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ब-ख़ुदा हैं तिरी हिन्दू बुत-ए-मय-ख़्वार आँखें
नश्शे की डोरी नहीं पहनें हैं ज़ुन्नार आँखें
हातिम अली मेहर
ग़ज़ल
ब-ख़ुदा हैं तिरी हिन्दू बुत-ए-मय-ख़्वार आँखें
नश्शे की डोरी नहीं पहने हैं ज़ुन्नार आँखें
हातिम अली मेहर
शेर
ज़ाहिद का दिल न ख़ातिर-ए-मय-ख़्वार तोड़िए
सौ बार तो ये कीजिए सौ बार तोड़िए
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
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ग़ज़ल
जगह दें लाख आँखों में 'शफ़ीअ'' मय-ख़्वार-ए-मय-ख़ाना
मगर फिर भी जनाब-ए-शैख़ की तौहीन होती है
हाजी शफ़ीउल्लाह शफ़ी बहराइची
नज़्म
दार-ओ-रसन
हज़ारों ज़ुल्फ़-ए-परी-वश के याँ थे सौदाई
हज़ारों मय-कश-ओ-मय-ख़्वार-ओ-मस्त-ओ-सहबाई