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ग़ज़ल
दे सुबूही जल्द साक़ी अब नहीं माह-ए-सियाम
बे-सबब क्यूँ राह देखें शाम की मय-ख़्वार-ए-सुब्ह
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
शेर
ज़ाहिद का दिल न ख़ातिर-ए-मय-ख़्वार तोड़िए
सौ बार तो ये कीजिए सौ बार तोड़िए
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
अप्रचलित ग़ज़लें
کب فقیروں کو رسائی بت مے خوار کے پاس
تو بتے بو دیجیے میخانے کی دیوار کے پاس
मिर्ज़ा ग़ालिब
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नज़्म
दार-ओ-रसन
हज़ारों ज़ुल्फ़-ए-परी-वश के याँ थे सौदाई
हज़ारों मय-कश-ओ-मय-ख़्वार-ओ-मस्त-ओ-सहबाई
मोहम्मद अली तिशना
ग़ज़ल
फ़ज़्ल लखनवी
शेर
फ़ज़्ल लखनवी
ग़ज़ल
बैत-ए-अबरू पे नए तिल में ये मज़मूँ है और
चढ़ गए रात किसी शाइ'र-ए-मय-ख़्वार के हाथ
मुंशी बनवारी लाल शोला
ग़ज़ल
माने-ए-मस्ती को बद-मस्ती दिखाना चाहिए
मोहतसिब का शीशा-ए-दिल ऐ बुत-ए-मय-ख़्वार तोड़
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
जगह दें लाख आँखों में 'शफ़ीअ'' मय-ख़्वार-ए-मय-ख़ाना
मगर फिर भी जनाब-ए-शैख़ की तौहीन होती है
हाजी शफ़ीउल्लाह शफ़ी बहराइची
ग़ज़ल
दुख़्तर-ए-रज़ की निगाहों से बचाए अल्लाह
आप ने 'रासिख़'-ए-मय-ख़्वार की हालत देखी
मोहम्मद यूसुफ़ रासिख़
ग़ज़ल
जो मय-कदे में ये मय-ख़्वार आ के बैठे हैं
न बे-ग़रज़ के न बे-मुद्दआ के बैठे हैं