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ग़ज़ल
मर्सिया हो मुझे गाना जो सुनूँ फ़ुर्क़त में
बे-तेरे बज़्म-ए-ग़िना मजलिस-ए-मातम हो जाए
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
कहते हैं निस्फ़ मुलाक़ात है मक्तूब भी यार
कभी लिक्खो तो सू-ए-मातम-ए-नालाँ काग़ज़
मातम फ़ज़ल मोहम्मद
ग़ज़ल
मजलिस-ए-मातम बनी आने से उन के बज़्म-ए-ऐश
पड़ गया फूलों में मेरे ग़ुल मुबारकबाद का
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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मर्सिया
होगी उन्हीं से मजलिस-ए-मातम की ज़ेब-ओ-ज़ैन
देंगे उन्हें वो लब कि रहे जिस पे वा हुसैन
मीर अनीस
ग़ज़ल
ग़म काहे का यारो मातम क्या बदलोगे निज़ाम-ए-आलम क्या
मरना था 'रज़ा' को मरता है ये काहे का रोना धोना है
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
चाहने वालों का करता है ज़माना मातम
मातमी रंग में है ज़ुल्फ़-ए-रसा मेरे ब'अद