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नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
हाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आह ये मजमा-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश
आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
दम-ए-आख़िर मिरी बालीं पे मजमा' है हसीनों का
फ़रिश्ता मौत का फिर आए पर्दा हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
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ग़ज़ल
भरे हैं तुझ में वो लाखों हुनर ऐ मजमा-ए-ख़ूबी
मुलाक़ाती तिरा गोया भरी महफ़िल से मिलता है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है
नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
इतनी ख़ामोशी से निकले हैं तिरे शोर से हम
जैसे बाज़ार के मजमा' से जनाज़ा निकले
इब्राहीम अली ज़ीशान
शेर
भरे हैं तुझ में वो लाखों हुनर ऐ मजमा-ए-ख़ूबी
मुलाक़ाती तिरा गोया भरी महफ़िल से मिलता है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
आड़ी सीधी पड़ती हैं नज़रें तुम्हीं पर आज तो
मजमा-ए-तार-ए-नज़र क्या बद्धियाँ हो जाएगा
आग़ा शाइर क़ज़लबाश
नज़्म
उन का जश्न-ए-साल-गिरह
इक मजमा-ए-रंगीं में वो घबराई हुई सी
बैठी है अजब नाज़ से शरमाई हुई सी

