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नज़्म
तख़रीब-कारों की शहादत
दहशतें इक पालिसी हैं जिस के मेकर आप हैं
तीसरी दुनिया के पहले हाई-जेकर आप हैं
खालिद इरफ़ान
लेख
मोहम्मद अहसन फ़ारूक़ी
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ग़ज़ल
मन की दुनिया मन की दुनिया सोज़ ओ मस्ती जज़्ब ओ शौक़
तन की दुनिया तन की दुनिया सूद ओ सौदा मक्र ओ फ़न
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आदमी-नामा
शैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोर
और हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
मक्र की चालों से बाज़ी ले गया सरमाया-दार
इंतिहा-ए-सादगी से खा गया मज़दूर मात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
क़दम क़दम खुले हुए हैं मक्र-ओ-फ़न के मदरसे
मगर ये मेरी सादगी तो देखिए कि आज भी
आमिर उस्मानी
नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
एक ऐसी जगह जिस में इंसान न बस्ते हों
ये मक्र ओ जफ़ा-पेशा हैवान न बस्ते हों
अख़्तर शीरानी
शेर
हक़ीक़त को छुपाया हम से क्या क्या उस के मेक-अप ने
जिसे लैला समझ बैठे थे वो लैला की माँ निकली
राग़िब मुरादाबादी
नज़्म
चाँद तारों का बन
कुछ इमामान-ए-सद-मक्र-ओ-फ़न
उन की साँसों में अफ़ई की फुन्कार थी
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
औरत
उसी का रूप धारे फिर रही हैं कुछ चुड़ैलें भी
मैं औरत ही नहीं कहता किसी मक्कार औरत को
अरशद महमूद अरशद
हास्य
मैं ने पूछा कि ये क्या हाल बना रखा है
न तो मेक-अप है न बालों को सजा रखा है



