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ग़ज़ल
मन की दुनिया मन की दुनिया सोज़ ओ मस्ती जज़्ब ओ शौक़
तन की दुनिया तन की दुनिया सूद ओ सौदा मक्र ओ फ़न
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आदमी-नामा
शैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोर
और हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमी
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
ऐ इश्क़ कहीं ले चल
एक ऐसी जगह जिस में इंसान न बस्ते हों
ये मक्र ओ जफ़ा-पेशा हैवान न बस्ते हों
अख़्तर शीरानी
नज़्म
चाँद तारों का बन
कुछ इमामान-ए-सद-मक्र-ओ-फ़न
उन की साँसों में अफ़ई की फुन्कार थी
मख़दूम मुहिउद्दीन
ग़ज़ल
पुर-ग़ुरूर ओ पुर-तकब्बुर पुर-जफ़ा ओ पुर-सितम
पुर-फ़रेब ओ पुर-दग़ा पुर-मक्र ओ पुर-फ़न आप हैं
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
यार से मेरी जो करते हैं सिफ़ारिश अग़्यार
मक्र है उज़्र है क़ाबू है दग़ा है क्या है
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
नज़्म
हुसूल-ए-आज़ादी की दिक़्क़तें
देखना तुम से अभी कितने किए जाएँगे मक्र
किस तरह तुम को अभी चक्कर में लाया जाएगा
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
कैसे टहलता है चाँद
क़ब्र तो मिट्टी का मक्र है
फिर परिंदे सूरज से पहले किसी का ज़िक्र करते हैं




