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नज़्म
परछाइयाँ
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जाए
ममता के सुनहरे ख़्वाबों की अनमोल निशानी बिकती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हिण्डोला
निज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयात
ब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सी
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
वही साथी है जो रफ़ीक़ है वही यार है जो सदीक़ है
वही मेहर है वही मामता तुम्हें याद हो कि न याद हो
इस्माइल मेरठी
नज़्म
औरत
है माँ तो दिल-ओ-जाँ से लुटाती है सदा प्यार
ममता के लिए फिरती है दौलत सर-ए-बाज़ार
रहबर जौनपूरी
नज़्म
माँ तिरे जाने के बा'द
किस के चेहरे में तलाशूँ तेरे चेहरे की झलक
किस के आँचल में मिलेगी तेरी ममता की महक
शहनाज़ परवीन शाज़ी
ग़ज़ल
ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है 'मंज़र'
तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को
मंज़र भोपाली
नज़्म
चकले
ममता के होंटों पर जब चाँदी की मोहरें लगती हैं
माँ ख़ुद अपनी बेटी को कर देती है क़ुर्बान यहाँ
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
गवारा कब है ममता को मिरा यूँ धूप में चलना
मिरी माँ ओढ़नी फैला के इक छाता बनाती है
साबिर शाह साबिर
नज़्म
एक ज़ाती नज़्म
जब आया मामता के लफ़्ज़ की सूरत में आया है
मिरी वीरान आँखों ने फिर ऐसा वक़्त भी देखा

