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ग़ज़ल
हम ने माना कि तही-दस्त हैं पर सब के लिए
दिल में गंजीना-ए-इख़लास-ओ-वफ़ा रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
कटीं जो उँगलियाँ दामन-दरी यूसुफ़ की बा'इस है
सज़ा क्यूँकर न मिलती दस्त-ए-गुस्ताख़ी ज़ुलेख़ा को
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर देहलवी
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ग़ज़ल
हुई है माने-ए-ज़ौक़-ए-तमाशा ख़ाना-वीरानी
कफ़-ए-सैलाब बाक़ी है ब-रंग-ए-पुम्बा रौज़न में
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
साफ़ कर दिल ताकि हो आईना-ए-रुख़्सार-ए-यार
माना-ए-रौशन-दिली है ज़ंग इस आहन के बीच