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ग़ज़ल
'अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है
तुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
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शेर
किसी को कोसते क्यूँ हो दुआ अपने लिए माँगो
तुम्हारा फ़ाएदा क्या है जो दुश्मन का ज़रर होगा
आग़ा अकबराबादी
नअत
माँगो तो ज़रा उन के तवस्सुत से कभी कुछ
मक़्बूल न हो ऐसी दुआ कोई नहीं है
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
शेर
जो भी दे दे वो करम से वही ले ले 'नादिर'
मुँह से माँगो तो ख़ुदा और ख़फ़ा होता है
नादिर शाहजहाँ पुरी
शेर
अदू को छोड़ दो फिर जान भी माँगो तो हाज़िर है
तुम ऐसा कर नहीं सकते तो ऐसा हो नहीं सकता
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
किसी को कोसते क्यूँ हो दुआ अपने लिए माँगो
तुम्हारा फ़ाएदा क्या है जो दुश्मन का ज़रर होगा
आग़ा अकबराबादी
नज़्म
चकले
भीक में भी माँगो तो कोई प्यार न डाले झोली में
बिन माँगे मिल जाते हैं रुस्वाई के सामान यहाँ
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
मेरे पुरखों की पहली दुआ
इस की क़िस्मत की माँगो दुआ
अब भी मेरी समाअ'त पे लिक्खी है वो





