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हिंदी ग़ज़ल
जिएँ तो अपने बग़ैचा में गुल-मुहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुल-मुहर के लिए
दुष्यंत कुमार
नज़्म
बरसात की बहारें
मारे हैं मौज डाबर दरिया दौंड़ रहे हैं
मोर-ओ-पपीहे कोयल क्या क्या रुमंड रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
नाज़ ओ अदा ओ ग़म्ज़ा निगह पंजा-ए-मिज़ा
मारें हैं एक दिल को ये पिल पिल के चार पाँच
बहादुर शाह ज़फ़र
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ग़ज़ल
उस के नाम पे मारें खाना अब ए'ज़ाज़ हमारा
और किसी की ये 'इज़्ज़त औक़ात नहीं देखी
उबैदुल्लाह अलीम
शेर
दौलत-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ना से हैं तवंगर हम लोग
जूतियाँ मारें हैं इक़बाल के सर पर हम लोग
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
हास्य
अपनी बारी पे मरें ये एक साहब ने कहा
जीना भी मुश्किल है मरना भी है मुश्किल क्या करूँ
पॉपुलर मेरठी
ग़ज़ल
शायद रक़ीब डूब मरें बहर-ए-शर्म में
डूबेंगे मौज-ए-अश्क की तुग़्यानियों में हम









