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ग़ज़ल
मर्ग-ए-आशिक़ पर जो बरहम हो दो-आलम का वरक़
हैफ़ है ऐ जाँ तुझे मलना कफ़-ए-अफ़सोस का
करामत अली शहीदी
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ग़ज़ल
वो भी हैं अफ़्सुर्दा मर्ग-ए-आशिक़-ए-नाशाद पर
कहने वाला कौन है अब मर्हबा बेदाद पर
तिलोकचंद महरूम
ग़ज़ल
मर्ग-ए-आशिक़ का 'अबस है सोग हर दम इस क़दर
छुट गया वो क़ैद-ए-ग़म से तुम को फ़ुर्सत हो गई
मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम
शेर
ख़ाक-ए-आशिक़ से जो उगता है मुग़ीलाँ का दरख़्त
उस की मिज़्गाँ का है मरक़द में भी खटका बाक़ी
आशिक़ अकबराबादी
ग़ज़ल
ख़ाक-ए-आशिक़ से उगाता है मुग़ीलाँ का दरख़्त
उस की मिज़्गाँ का है मरक़द में भी खटका बाक़ी
आशिक़ अकबराबादी
ग़ज़ल
मैं ने जो कहा रंज है क्या मर्ग-ए-अदू का
बोले कि नहीं मेरी तबीअत नहीं अच्छी