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नज़्म
दोस्ती का हाथ
तुम्हें भी ज़िद है कि मश्क़-ए-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि जौर-ओ-जफ़ा के आदी हैं
अहमद फ़राज़
नज़्म
लौह-ओ-क़लम
हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी
हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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rashk
रश्क رَشْک
ईर्ष्याजन्य यह विचार कि जैसा वह है वैसा मुझे भी होना चाहिए अथवा मैं किसी प्रकार उसके स्थान पर हो जाता, दूसरे की चीज़ देख कर दुखी होना, किसी को हानि पहुँचाये बिना उस जैसा बनने की भावना, ईर्ष्या
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ग़ज़ल
बिगड़े हुए तेवर हैं नौ-उम्र सियासत के
बिफरी हुई साँसें हैं नौ-मश्क़ निज़ामों की
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
जनाब-ए-शैख़ को ये मश्क़ है याद-ए-इलाही की
ख़बर होती नहीं दिल को ज़बाँ से याद करते हैं
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
ये कब तक सीम-ओ-ज़र के जंगलों में मश्क़-ए-ख़ूँ-ख़्वारी
ये इंसानों की बस्ती है अब इंसानों में आ जाओ



