aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mauj-e-ruud-e-ga.ngaa"
मौज-ए-दरिया पब्लिशर्स
पर्काशक
बज़्म-ए-रूह-ए-अदब, टांडा
अंजुमन-ए-रूह-ए-अदब, इलाहाबाद
हज़रत राद जौनपुरी
लेखक
रूह-ए-असर, कराची
महफ़िल-ओ-गंग-ओ-जमन
इदारा-ए-गंग-ओ-जमन, जमशेदपुर
रूह-ए-अदब पब्लिकेशंस, कोलकाता
हज़रत मसीह-ए-मौऊद
बज़्म-ए-उर्दू, मऊ
इदारह तहक़ीक़ात-ए-इस्लामी
अराकीन-ए-ग़ाज़ी कमेटी, मऊ
गांधी फै़ज़े-आम कॉलेज, शाहजहानपुर
मकतबा-ए-शरीफ़या गंगोह, सहारनपूर
अहल-ए-हदीस अकेडमी, मऊ
ऐ आब-रूद-ए-गंगा उफ़ री तिरी सफ़ाईये तेरा हुस्न दिल-कश ये तर्ज़-ओ-दिल-रुबाईतेरी तजल्लियाँ हैं जल्वा-फ़रोश मा'नीतनवीर में है तेरी इक शान-ए-किब्रियाईजमुना तिरी सहेली गो साथ की है खेलीउस में मगर कहाँ है तेरी सी जाँ-फ़ज़ाईबे-लौस तेरा दामन है दाग़-ए-मासियत सेमौज़ूँ है तेरे क़द पर मल्बूस-ए-पारसाईदिल-बंद हम हैं तेरे लख़्त-ए-जिगर हैं तेरेनख़्ल-ए-मुराद है तौ और हम समर हैं तेरे
तू ऐ कावेरी है रश्क-ए-रूद-ए-नीलतेरी इक इक मौज मौज-ए-सलसबील
तू प्रेम मंदिर की पाक देवी तू हुस्न की मम्लिकत की रानीहयात-ए-इंसाँ की क़िस्मतों पर तिरी निगाहों की हुक्मरानीजहान-ए-उल्फ़त तिरी क़लम-रौ हरीम-ए-दिल तेरी राजधानीबहार-ए-फ़ितरत तिरे लब-ए-लाल-गूँ की दोशीज़ा मुस्कुराहटनिज़ाम-ए-कौनैन तेरी आँखों के सुर्ख़ डोरों की थरथराहटफ़रोग़-ए-सद-काएनात तेरी जबीन सीमीं की ज़ौ-फ़िशानीभड़कते सीनों में बस रही हैं क़रार बन कर तिरी अदाएँतरसती रूहों को जाम-ए-इशरत पिला रही हैं तिरी वफ़ाएँरग-ए-जहाँ में थिरक रही है शराब बन कर तिरी जवानीदिमाग़-ए-परवर-दिगार में जो अज़ल के दिन से मचल रहा थाज़बान-ए-तख़्लीक़-ए-दहर से भी न जिस का इज़हार हो सका थानुमूद तेरी उसी मुक़द्दस हसीं तख़य्युल की तर्जुमानीहै वादी-ए-नील पर तिरा अब्र-ए-ज़ुल्फ़ साया-कुनाँ अभी तकहैं जाम-ए-ईराँ की मय में तेरे लबों की शीरीनियाँ अभी तकफ़साना-गो है तिरी अभी तक हदीस-ए-यूनाँ की ख़ूँ-चकानीहै तेरी उल्फ़त के राग पर मौज-ए-रूद-ए-गंगा को वज्द अब तकतिरी मोहब्बत की आग में जल रहा है सहरा-ए-नज्द अब तकजमाल-ए-ज़ोहरा तिरे मलाएक फ़रेब जल्वों की इक निशानीतिरी निगाहों के सहर से गुल-फ़िशाँ है शेर ओ अदब की दुनियातिरे तबस्सुम के कैफ़ से है ये ग़म की दुनिया तरब की दुनियातिरे लबों की मिठास से शक्करीं है ज़हराब-ए-जिंदगानीतिरा तबस्सुम कली कली में तिरा तरन्नुम चमन चमन मेंरुमूज़-ए-हस्ती के पेच-ओ-ख़म तेरे गेसुओं की शिकन शिकन मेंकिताब-ए-तारीख़-ए-ज़िंदगी के वरक़ वरक़ पर तिरी कहानीजो तू न होती तो यूँ दरख़्शंदा शम-ए-बज़्म-ए-जहाँ न होतीवजूद-ए-अर्ज़-ओ-समा न होता नुमूदद-ए-कौन-ओ-मकाँ न होतीबशर की महदूदियत की ख़ातिर तरसती आलम की बे-करानी
जो गर्द साथ न उड़ती सफ़र न यूँ कटताग़ुबार-ए-राहगुज़र मौज-ए-बाल-ओ-पर निकला
बे-कराँ हूँ मैं समुंदर की तरहमौज-ए-शबनम क़द मिरा नापेगी क्या
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मायूसी ज़िंदगी में एक मनफ़ी क़दर के तौर पर देखी जाती है लेकिन ज़िंदगी की सफ़्फ़ाकियाँ मायूसी के एहसास से निकलने ही नहीं देतीं। इस सब के बावजूद ज़िंदगी मुसलसल मायूसी से पैकार किए जाने का नाम ही है। हम मायूस होते हैं लेकिन फिर एक नए हौसले के साथ एक नए सफ़र पर गामज़न हो जाते हैं। मायूसी की मुख़्तलिफ़ सूरतों और जहतों को मौज़ू बनाने वाला हमारा ये इन्तिख़ाब ज़िंदगी को ख़ुश-गवार बनाने की एक सूरत है।
लखनवी शाइ’री की तीसरी पीढ़ी के प्रमुख प्रतिनिधि शाइ’र। ख़्वाजा ‘आतिश’ के लाइक़ शागिर्द थे। अफ़ीम का शौक़ था, ख़ुद खाते और मेहमानों को खिलाते। वाजिद अ’ली शाह ने दो सौ रुपए माहवार वज़ीफ़ा बाँध रखा था, जिससे ऐश में गुज़रती थी।
सय्यद अब्बास मुत्तक़ी
Mauj-e-Toofan-o-Shor-e-Baran
सय्यद मोहम्मद वज़ीर
मुसद्दस
Rood-e-Kausar
शैख़ मोहम्मद इकराम
Mauj-e-Adab
कौसर मज़हरी
Mauj-e-Saba
Mauj-e-Naseem-e-Hijaz
ताजुद्दीन अशअर
नात
Mauj-e-Bada
मोहम्मद इस्राईल क़ौस
Mauj-e-Gul Mauj-e-Saba
राही मासूम रज़ा
Mauj-e-Khoon
इरफ़ान तुराबी
शाइरी
Mauj-e-Zam-Zam
आग़ा मोहम्मद शाह हश्र
मौज-ए-नूर
मक़सूद आलम रिज़वी
Mauj-e-Darya
इरफ़ान सिद्दीक़ी
Mauj-e-Bala
नॉवेल / उपन्यास
Mauj-e-Tabassum
शौकत थानवी
Mauj-e-Rang
नुद्रत कानपुरी
फिर से साहिल का खिल उठा चेहरामौज-ए-तूफ़ान टल रही है क्या
ये मौज ता-कि सफ़ीने को गर्म-रौ रक्खेकुछ आग ख़ेमा-ए-आब-ए-रवाँ में रख देना
किनारे मौज से मिलते रहे थेमगर अब मस्ती-ए-साहिल नई थी
नफ़स के तार टूटे जा रहे हैंकि चश्म-ए-'मौज' पुर-नम हो रही है
बैठा है 'मौज' बज़्म में इस का भी कर ख़यालपहलू में तेरे दर्द-ए-मोहब्बत लिए हुए
है इस को फ़क़त अपनी ही अज़रा का जुनूँये 'मौज' भी ऐ दोस्तो वामिक़ निकला
मुट्ठी में जकड़ रक्खा है हर मौज-ए-रवाँ कोबेताब समुंदर को उछलने नहीं देते
इक सुबुक मौज है इक लौह-ए-दरख़्शाँ पे रवाँहै तमाशाई यहाँ सारा जहाँ हम-नफ़सो
सीने में मौजज़न नहीं तूफ़ान-ए-आरज़ूटकराए किस से मौज कि साहिल नहीं रहा
है वही आज भी रंग-ओ-रविश-ए-रूद-ए-फ़रातहर नफ़स मातमी-ए-तिश्ना-लबाँ है कि जो था
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