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ग़ज़ल
वो जो मौसम-ए-गर्मा की पहली बारिश का छींटा था
तप वाले आँगन में सोंधी ख़ुशबू बन कर बिखरा था
तलअत इशारत
ग़ज़ल
मौसम-ए-गर्मा की आमद मिरे सहराओं में 'कैफ़'
'ऐन मुमकिन है दरख़्तों पे ख़ज़ाने लग जाएँ
सय्यद हुज़ैफ़ा कैफ़
नस्री-नज़्म
अहमद नियाज़ रज़्ज़ाक़ी
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ग़ज़ल
तुख़्म में रोईदगी हर नख़्ल में बालीदगी
मौसम-ए-सरमा-ओ-गरमा बाद-ओ-बाराँ अब भी है
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
सर के ऊपर ख़ाक उड़ी तो सब दिल थाम के बैठ गए
ख़बर नहीं थी गुज़र चुका है मौसम अब्र-ए-नवाज़िश का