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शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
नज़्म
तराना-ए-मिल्ली
तौहीद की अमानत सीनों में है हमारे
आसाँ नहीं मिटाना नाम-ओ-निशाँ हमारा
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
जनम जनम के सातों दुख हैं उस के माथे पर तहरीर
अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
पंद्रह अगस्त
जो ज़ख़्म तन पे है भारत के उस को भरना है
जो दाग़ माथे पे भारत के है मिटाना है
जावेद अख़्तर
नज़्म
दोस्ती का हाथ
ज़मीं से नक़्श मिटाने को ज़ुल्म ओ नफ़रत का
फ़लक से चाँद सितारे उतारने के लिए
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
वो रश्क-ए-ग़ैर पर रो रो के हिचकी मेरी बंध जाना
फ़रेबों से वो तेरा शक मिटाना याद आता है
निज़ाम रामपुरी
ग़ज़ल
बे-झिजक आ के मिलो हँस के मिलाओ आँखें
आओ हम तुम को सिखाते हैं मिलाना दिल का
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
अभी तो पूंजी-वाद को जहान से मिटाना है
अभी तो सामराजों को सज़ा-ए-मौत पाना है
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
प्यार का जश्न
प्यार का जश्न नई तरह मनाना होगा
ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
बचपन का वो ज़माना
दादी को मैं ने इक दिन ये मशवरा दिया था
चेहरे की झुर्रियों को आसान है मिटाना
अब्दुल क़ादिर
ग़ज़ल
मिटाना था उसे भी जज़्बा-ए-शौक़-ए-फ़ना तुझ को
निशान-ए-क़ब्र-ए-मजनूँ दाग़ है सहरा के दामन में
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
मर्सिया-ए-देहली-ए-मरहूम
मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो
ऐ फ़लक इस से ज़्यादा न मिटाना हरगिज़


