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नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
मोर-ए-बे-पर हाजते पेश-ए-सुलैमाने मबर
रब्त-ओ-ज़ब्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा है मशरिक़ की नजात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मौत का गीत
मोर-ए-बे-जाँ से सुलैमान बहुत खेल चुका
वक़्त है आओ दो-आलम को दिगर-गूँ कर दें
मख़दूम मुहिउद्दीन
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mar ke
मर केمَر کے
मरने के बाद, मौत आ जाने पर
maar ke
मार केمار کے
برائے اظہارِ کثرت ؛ جیسے : مار کر بچھا دیا ، مار کے تباہ کر دیا وغیرہ ؛ ضرب لگا کے ، زد و کوب کرکے ؛ جیسے : مار کے بھگا دیا .
le mar
ले मरلے مَر
अपनी ही ज़िद पूरी कर, अपना ही कहा कर (तंग आकर कहते हैं)
mar ke uThnaa
मर के उठनाمَر کے اُٹھنا
मरने तक पड़ा रहना, मुस्तक़िल पड़ा रहना
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नज़्म
शिकवा
क़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़
ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तक़दीर-ए-भारत
नहीफ़-ओ-ज़ार पाबंद-ए-सलासिल बे-ज़र-ओ-बे-पर
है कितनी जाँ-गुदाज़-ओ-दिल-शिकन तस्वीर भारत की
नो बहार साबिर
ग़ज़ल
अजब दस्तूर है अबरार इस दुनिया-ए-बे-पर का
शिकस्ता-रंग पत्तों पर फ़िदा शबनम नहीं होती
ख़ालिद अबरार
नअत
गिरते पड़ते दर-ए-सरकार तक आ पहुँचा है
हम से पूछे कोई इक ताइर-ए-बे-पर के मज़े
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
ताइर-ए-बे-पर बचे क्या दाम से सय्याद के
ज़द में जब सारी फ़ज़ा-ए-गुल्सिताँ तक आ गई
मुस्लिम मलेगाँवी
ग़ज़ल
नावक-ए-बे-पर अगर है उस की मिज़गान-ए-दराज़
क़ौस क्यों समझे न आशिक़ अबरू-ए-ख़मदार को
