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ग़ज़ल
मुद्दतों दार-ओ-रसन ज़ीस्त का उनवान रहे
मोरिद-ए-संग हैं इस शहर में सर मुद्दत से
शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
बारिश-ए-संग-ए-अलम अपना मुक़द्दर ठहरी
राहत-ए-दर्द मिली लुत्फ़-ओ-करम के बदले
नूर-ए-शमा नूर
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ग़ज़ल
मैं ही तन्हा हूँ यहाँ उस की सलाबत का गवाह
कौन उठा कर ये मिरा संग-ए-हुनर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो
है दर-ए-दिल पे कोई संग-ए-गिराँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
शेर
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
है नाज़ संग को कि वही इक है वज्ह-ए-ज़ख़्म
शीशे को आज उस के मुक़ाबिल में छोड़ दो
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
निज़ाम-ए-वक़्त का अब ख़ूँ निचोड़ना होगा
कि संग-ए-सख़्त अदाओं की अंजुमन में है