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ग़ज़ल
रक़्स-ए-बिस्मिल के मुक़द्दर में है दश्त-ओ-सहरा
और मुजरे सर-ए-बाज़ार हुआ करते हैं
नासिर मिस्बाही
ग़ज़ल
मजाल किस की जो हर चार चश्म उस के हुज़ूर
अदब से मुजरे को हर इक झुकाए सर आवे
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
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रेख़्ता शब्दकोश
mujhe
मुझेمُجھے
एक पुरुषवाचक सर्वनाम जो उत्तम पुरुष, एकवचन और उभयलिग है तथा वक्ता या उसके नाम की ओर संकेत करता है । यह 'मैं' का वह रूप है जो उसे कर्म और संप्रदान कारक में प्राप्त होता है । इसमें लगी हुई एकार की मात्रा विभक्ति का चिह्न है, इसलिये इसके आगे कारक चिह्न नहीं लगता, मुझको
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ग़ज़ल
हमेशा चश्म में रहना मुझे अच्छा नहीं लगता
मैं रहना चाहता हूँ ऐ समुंदर तेरे पानी में
फ़ैज़ राहील ख़ान
ग़ज़ल
हम से ग़रीब भी भला मुजरे के बारयाब हों
इज़्न तेरा कभी कभी आम रहा तो क्या हुआ

