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नज़्म
मशरब
हाँ ताश के पत्तों में कुछ अहबाब तो मशग़ूल
जो मुंतशिर-ए-याद हो दिल कैसे भुलाए
मीम हसन लतीफ़ी
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ग़ज़ल
हमें दा'वा था देखेंगे वो क्यूँकर याद आते हैं
रग-ए-जाँ बन गए हैं अब फ़ुज़ूँ-तर याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
शेर
क्यूँ उजाड़ा ज़ाहिदो बुत-ख़ाना-ए-आबाद को
मस्जिदें काफ़ी न होतीं क्या ख़ुदा की याद को