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नज़्म
मशरब
हाँ ताश के पत्तों में कुछ अहबाब तो मशग़ूल
जो मुंतशिर-ए-याद हो दिल कैसे भुलाए
मीम हसन लतीफ़ी
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ग़ज़ल
मैं ने सोचा था मिटा दूँ याद-ए-माज़ी के नुक़ूश
नींद ने आँखों में फिर यादों के पैकर रख दिए
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
एहतिसाब-ए-ज़ीस्त करने के लिए बैठा था मैं
याद आई दोस्तों की कार-फ़रमाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
हमें दा'वा था देखेंगे वो क्यूँकर याद आते हैं
रग-ए-जाँ बन गए हैं अब फ़ुज़ूँ-तर याद आते हैं