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नज़्म
तुलू-ए-इस्लाम
उरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ा
समझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह ओ दमन
मुझ को फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़-ए-चमन
अल्लामा इक़बाल
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नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआ
है पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
उड़ते ही रंग-ए-रुख़ मिरा नज़रों से था निहाँ
इस मुर्ग़-ए-पर-शिकस्ता की परवाज़ देखना
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
रश्क-ए-हम-तरही ओ दर्द-ए-असर-ए-बांग-ए-हज़ीं
नाला-ए-मुर्ग़-ए-सहर तेग़-ए-दो-दम है हम को
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-दिलदारी-ए-गुलज़ार करूँ या न करूँ
ज़िक्र-ए-मुर्ग़ान-ए-गिरफ़्तार करूँ या न करूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
क्या छोड़ें असीरान-ए-मोहब्बत को वो जिस ने
सदक़े में न इक मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार भी छोड़ा
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
बद-गुमाँ होता है वो काफ़िर न होता काश के
इस क़दर ज़ौक़-ए-नवा-ए-मुर्ग़-ए-बुस्तानी मुझे
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
फँसा देता है मुर्ग़-ए-दिल को दाम-ए-ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ में
तुम्हारे ख़ाल-ए-रुख़ को भी फ़रेब-ए-दाना आता है
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
दिल-ए-ग़मीं के मुआफ़िक़ नहीं है मौसम-ए-गुल
सदा-ए-मुर्ग़-ए-चमन है बहुत नशात अंगेज़


