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ग़ज़ल
क्या तह में समुंदर की 'गुहर' ढूँड रहा है
मेरी सदफ़-ए-चश्म में अश्कों के 'गुहर' देख
गुहर खैराबादी
ग़ज़ल
रुकते हैं कब रोकने से मौज-ए-तूफ़ाँ के 'गुहर'
हौसले वाले पहुँच जाते हैं साहिल के क़रीब
गुहर खैराबादी
ग़ज़ल
जहाँ सुरों की हक़ीक़त न हो वहाँ पे 'गुहर'
जो कोई माँगे तो क्या ताज-ए-ख़ुसरवी माँगे
गुहर खैराबादी
ग़ज़ल
सरफ़राज़ी मिरी क़िस्मत में न थी वर्ना 'गुहर'
नोक-ए-नेज़ा पे पहुँचना कोई दुश्वार न था
गुहर खैराबादी
ग़ज़ल
जब सर्फ़-ए-गुफ़्तुगू हूँ तो देखे उन्हें कोई
मंज़ूर हो जो अब्र-ए-गुहर-बार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
दस्तरस आसाँ नहीं कुछ ख़िर्मन-ए-मअ'नी तलक
जो भी आएगा वो लफ़्ज़ों के गुहर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
क़तरों को रोज़ देते हैं ये दर्स-ए-इज्तिहाद
फिर कैसे मान लूँ कि गुहर बोलते नहीं
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
क़ितआ
गरचे है मुश्त-ए-ग़ुबार आदम ओ हव्वा का वजूद
उन की रिफ़अत पे बरसते हैं सितारों के सुजूद