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ग़ज़ल
महव-ए-दिलदार हूँ किस तरह न हूँ दुश्मन-ए-जाँ
मुझ पे जब नासेह-ए-बेदर्द को प्यार आ जाए
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
'नाज़िम' हिकायत-ए-ग़म-ए-हिज्राँ तमाम कर
शुक्र-ए-ख़ुदा कि नासेह-ए-बे-सर्फ़ा-गो गया
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
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ग़ज़ल
नासेह-ए-मस्लहत-नवाज़ तुझ को बताऊँ क्या ये राज़
हौसला-ए-निगाह है ख़ून-ए-जिगर के बाद भी
अली जवाद ज़ैदी
ग़ज़ल
कमाल-ए-सूरत-ए-बे-दर्द से तनफ़्फ़ुर है
न देखें हम कभी उस गुल को जिस में ख़ार न हो
इमाम बख़्श नासिख़
नज़्म
रात की बात
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द
उस के माथे से चुरा लेती है सोने की डलक
मुख़्तार सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
कहाँ तुम दोस्तों के सामने भी पी नहीं सकते
कहाँ हम रू-ब-रू-ए-नासेह-ए-बरहम भी पीते हैं
नुशूर वाहिदी
ग़ज़ल
जनाब-ए-नासेह-ए-मुशफ़िक़ नसीहत जब लगे करने
दिखाई चोंच हँस हँस कर उन्हें चाक-ए-गरेबाँ ने
शौक़ बहराइची
नज़्म
रिश्वत
ख़ूब हक़ के आस्ताँ पर और झुके अपनी जबीं
जाइए रहने भी दीजे नासेह-ए-गर्दूँ-नशीं