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ग़ज़ल
तुझ ज़ुल्फ़ के ख़याल सीं क्यूँकर निकल सकूँ
हर पेच-ओ-ख़म नमूना-ए-तौक़-ए-गुलू हुआ
सिराज औरंगाबादी
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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कुछ दे इसे रुख़्सत कर
आवारा ओ सरगर्दां कफ़नी-ब-गुलू-पेचाँ
दामाँ भी दुरीदा है गुदड़ी भी सँभाली है
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
गले से जिस तरह तौक़-ए-गुलू को मेरे उल्फ़त है
रहेगा पाँव से भी सिलसिला क़ाएम सलासिल का