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ग़ज़ल
हँस दिए ज़ख़्म-ए-जिगर जैसे कि गुल-हा-ए-बहार
मुझ पे माइल है बहुत नर्गिस-ए-शहला-ए-बहार
सुहैल काकोरवी
नज़्म
शाइ'र का तराना
महरम-ए-शबनम रफ़ीक़-ए-लाला-ए-सहरा हूँ मैं
हम-नशीन-ए-यासमीन-ओ-नर्गिस-ए-शहला हूँ मैं
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
ग़ज़ल
ख़त-ए-मुश्कीं को रैहाँ जानता हूँ बाग़-ए-आलम में
तिरी चश्म-ए-सियह को नर्गिस-ए-शहला समझता हूँ
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
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ग़ज़ल
जो ख़ुश-चश्मों की उल्फ़त में दिया बर्बाद जी अपना
लगाओ उस की तुर्बत पर लजा कर नर्गिस-ए-शहला
फ़त्तावत औरंगाबादी
नज़्म
दीवाली
अध-जले ईंधन का आँखों में धुआँ भरता हुआ
नर्गिस-ए-शहला में सीमाब-ए-ख़िज़ाँ भरता हुआ
शाद आरफ़ी
ग़ज़ल
गुलाबी ला'ल की हुई हर कली मय-नोश सुन तुझ को
चमन में है खड़ी ले जाम-ए-नीलम नर्गिस-ए-शहला
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
नज़्म
बिंत-ए-माहताब
न क्यूँ भला मैं तुझे बिंत-ए-माहताब कहूँ
जो आँख नर्गिस-ए-शहला की आबरू ले ले
सरताज आलम आबिदी
ग़ज़ल
रही है सर नवा सन्मुख गई है भूल मंसूबा
तिरी अँखियों नीं शायद मात की है नर्गिस-ए-शहला
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
जिस गुल को ये सब ढूँडती फिरती हैं हवाएँ
तू ने तो उसे नर्गिस-ए-शहला नहीं देखा
आग़ा शाइर क़ज़लबाश
ग़ज़ल
ये क़द बूटा सा गुल से गाल आँखें नर्गिस-ए-शहला
जवानी तुम पे क्या आई बहार आई गुलिस्ताँ में



