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ग़ज़ल
शराब पी चुके बे-चारे को इजाज़त दो
खड़ा है देर से रुख़्सत को ऐ निगार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
वाइ'ज़ शराब-ओ-हूर की उल्फ़त में ग़र्क़ है
है सर से पाँव तक ये सितम-गर तमाम हिर्स
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
मजाज़ी ख़ुदा
चार तिनकों का शौक़-ए-मकाँ क्या बना
ने'मत-ए-क़ुर्ब-ए-उल्फ़त भी जाती रही
इशरत मोईन सीमा
ग़ज़ल
हमें ये ने'मत-ए-उज़मा-रसा न क्यों मिलती
ख़ुदा ने इश्क़ को पैदा किया बशर के लिए
नज़ीर मोहम्मद आरज़ू जयपुरी
ग़ज़ल
उसे नसीब हुई ने'मत-ए-विला-ए-नबी
जहाँ से 'तहनियत' इस तरह शादमाँ गुज़री