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ग़ज़ल
जहान भर की तमाम आँखें निचोड़ कर जितना नम बनेगा
ये कुल मिला कर भी हिज्र की रात मेरे गिर्ये से कम बनेगा
उमैर नजमी
नज़्म
पंद्रह अगस्त
कि कल तलक था यहाँ कुछ भी अपने हाथ नहीं
विदेशी राज ने सब कुछ निचोड़ डाला था
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
यक-क़तरा ख़ूँ बग़ल में है दिल मिरी सो उस को
पलकों से तेरी ख़ातिर क्यूँ-कर निचोड़ डालूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
घनघोर घटा के आँचल को जब काली रात निचोड़ गई
इक तन्हाई को चैन मिला इक तन्हाई दम तोड़ गई
क़तील शिफ़ाई
शेर
ये थोड़ी थोड़ी मय न दे कलाई मोड़ मोड़ कर
भला हो तेरा साक़िया पिला दे ख़ुम निचोड़ कर
