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ग़ज़ल
सर-ए-महफ़िल तो कोई गुफ़्तुगू करती नहीं हो तुम
निगाहों से मिरे दिल के मगर पैग़ाम लेती हो
मित्तर सिंह अाशना
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ग़ज़ल
मैं 'आश्ना' वाक़िफ़ हूँ हालात-ए-गुलिस्ताँ से
जज़्बात की गर्मी है फूलों में न ख़ारों में