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नज़्म
नज़्र-ए-दिल
सर पे रख सकता हूँ ताज-ए-किश्वर-ए-नूरानियाँ
महफ़िल-ए-ख़ुर्शीद को नीचा दिखा सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
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piichhaa
पीछा پِیچھا
किसी चीज के पीछे की ओर का विस्तार। मुहा०-(किसी का) पोछा करना = (क) किसी को पकड़ने, भागने, मारने-पीटने आदि के लिए अथवा उसका पता लगाने या भेद लेने के लिए उसके पीछे-पीछे तेजी से चलना या दौड़ना। जैसे-अपराधी, चोर या शिकार का पीछा करना। (घ) किसी का भेद या रहस्य जानने के लिए छिपकर उसके पीछे-पीछे चलना। जैसे-वह जहाँ जाता था, वहीं पुलिस उसका पीछा करती थी। (ग) दे० नीचे ' पीछा पकड़ना '। (किसी काम या बात से) पीछा छुड़ाना अपने साथ होनेवाली किसी अनिष्ट या अप्रिय बात से अपना सम्बन्ध छुड़ाना। पिंड छुड़ाना। जैसे-अफीम या शराब की लत से पीछा छुड़ाना। (किसी व्यक्ति से) पोछा छुड़ाना-जो व्यक्ति किसी काम या बात के लिए पीछे पड़कर बहुत तंग कर रहा हो, उससे किसी प्रकार छुटकारा पाना। पीछा छूटना = (क) पीछा करनेवाले या पीछे पड़े हुए व्यक्ति से छुटकारा मिलना। पिंड छूटना। जान छूटना। (ख) अनिष्ट अथवा अप्रिय काम या बात से छुटकारा मिलना (ग)। किसी प्रकार का या किसी रूप में छुटकारा मिलना। बचाव या रक्षा होना। जैसे-महीनों बाद बुखार से पीछा छटा है। (किसी व्यक्ति का) पीछा छटना = किसी का पीछा करने का काम बंद करना। किसी आशा या प्रयोजन से किसी के साथ लगे फिरने या उसके पीछे-पीछे दौड़ने या उसे तंग करने का काम बंद करना। (किसी काम या बात का) पीछा छोड़ना = जिस काम या बात में बहुत अधिक उत्साह या तन्मयता से लगे रहे हों, उससे विरत होना अथवा उसका आसंग या ध्यान छोड़ना। पीछा दिखाना = (क) सम्मुख या साथ न रहकर अलग या दूर हो जाना। पीठ दिखाना। जैसे-संकट के समय संगी साथियों ने भी पीछा दिखाया। (ख) प्रतियोगिता, लड़ाई-झगड़े आदि में डर या हारकर भाग जाना। पीठ दिखाना। पीछा देना = (दे० ऊपर पीछा दिखाना '। (किसी का) पीछा पकड़ना = किसी आशा से या अपने कोई उद्देश्य सिद्ध करने के लिए किसी का अनुचर या साथी बनना। किसी के आश्रय या सहायता का आकांक्षी बनकर प्रायः उसके साथ लगे रहना। जैसे-किसी रईस का पीछा पकड़ना। (किसी काम या बात का) पीछा भारी होना = (क) पीछे की ओर शत्रु या संकट की आशंका या भय होना। (ख) अधिक उपयोगी या सहायक अंश का पीछे की ओर आधिक्य होना। (ग) किसी काम के अंतिम या शेष अंश का अधिक कठिन या अधिक कष्टसाध्य होना। पिछला अंश ऐसा होना कि सँभलना कठिन हो।
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नज़्म
गुरु-नानक
न पाक कोई न कोई नापाक कोई ऊँचा न कोई नीचा
गुरु का ये मय-कदा है इस जा हर इक को मिलता है जाम-ए-नानक
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
ईद का मेला
गर्दन ऊँची रस-गुल्ले की सर नीचा है बालाई का
हलवाई दाम बटोरने में सर मूंड रहा है नाई का
सय्यद ज़मीर जाफ़री
ग़ज़ल
इतनी शर्म तो होती थी आँखों में पहले वक़्तों में
गली में सर नीचा रखता जो बाहर दादा होता था
एहतिशाम हसन
ग़ज़ल
लड़ा दे आँखें वो बे-हिजाबी कि फिर पलक से पलक न मारे
नज़र जो नीची करे तो गोया खिला सरापा चमन हया का

