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ग़ज़ल
मैं निसार-ए-दस्त-ए-नाज़ुक जो उठाए नाज़िशाना
कि सँवर गईं ये ज़ुल्फ़ें तो सँवर गया ज़माना
जमील मज़हरी
शेर
अबस मल मल के धोता है तू अपने दस्त-ए-नाज़ुक को
नहीं जाने की सुर्ख़ी हाथ से ख़ून-ए-शहीदाँ की
मीर मोहम्मदी बेदार
नज़्म
मुतरबा
नग़्मा-ए-पुर-कैफ़ लब पर दस्त-ए-नाज़ुक साज़ पर
मुतरिबा क़ुर्बान हो जाऊँ मैं इस अंदाज़ पर
मुईन अहसन जज़्बी
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ग़ज़ल
रंग-ए-ज़ुल्म-ए-दस्त-ए-वहशत जब नुमायाँ हो गया
मंज़र-ए-क़ौस-ए-क़ुज़ह चाक-ए-गरेबाँ हो गया
क़द्र ओरैज़ी
ग़ज़ल
सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल
तू ने अपने तरकश में जो रक्खा है वो तीर निकाल
शाहिद कमाल
ग़ज़ल
वो जो फूल थे तिरी याद के तह-ए-दस्त-ए-ख़ार चले गए
तिरे शहर में भी सुकून है तिरे बे-क़रार चले गए
अजय सहाब
ग़ज़ल
दु'आ-ए-दस्त-ए-फ़ज़ीलत से सर की रौनक़ है
हमारे घर के बुज़ुर्गों से घर की रौनक़ है
अशहद करीम उल्फ़त
शेर
दस्त-ए-पुर-ख़ूँ को कफ़-ए-दस्त-ए-निगाराँ समझे
क़त्ल-गह थी जिसे हम महफ़िल-ए-याराँ समझे
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
दस्त-ए-पुर-ख़ूँ को कफ़-ए-दस्त-ए-निगाराँ समझे
क़त्ल-गह थी जिसे हम महफ़िल-ए-याराँ समझे

