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ग़ज़ल
है नोक-ए-ख़ार में कुछ वो तो सब्ज़ा-ज़ार में कुछ
ख़िज़ाँ में कुछ है मगर मौसम-ए-बहार में कुछ
जय प्रकाश गाफिल
ग़ज़ल
सिर्फ़ इक लर्ज़िश है नोक-ए-ख़ार पर शबनम की बूँद
फिर भी इस फ़ुर्सत पर उस की मुझ को रश्क आ जाए है
नियाज़ फ़तेहपुरी
नज़्म
गुल ब-नोक-ए-ख़ार
हवस के मारो में बाज़ार में हूँ
गुल-ए-तर हूँ प नोक-ए-ख़ार में हूँ
क़ैसर ज़िया क़ैसर
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nau-roz-e-KHaaraa
नौ-रोज़-ए-ख़ारा نَو رُوزِ خارا
(संगीत) संगित एक प्रकार के अनुभाग का नाम जो पाँच रगनियों पर आधारित है
chanaa kahe merii uu.nchii naak ghar daliye dau ghar raa.D, jo khaave meraa ek Tuuk paanii piive sau sau ghuu.nT
चना कहे मेरी ऊँची नाक घर दलिये दौ घर राड़, जो खावे मेरा एक टूक पानी पीवे सौ सौ घूँट چَنا کَہے میری اُونْچی ناک گَھر دَلِیے دَو گَھر راڑ، جو کھاوے میرا ایک ٹُوک پانی پِیوے سَو سَو گُھونٹ
चने के दिलने की आवाज़ बहुत दूर तक जाती है और उसे खा कर बहुत प्यास लगती है
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ग़ज़ल
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
न जाने क्या कहें ऐ 'ख़ार' आह-ए-सर्द को मेरी
मिरे नाले को जो बे-वक़्त की कहते हैं शहनाई
ख़ार देहलवी
नज़्म
पयाम-ए-हस्ती
तुझे ऐ दिल अदू को हो अगर चुभती हुई कहना
तो हर हर हर्फ़ में तेज़ी-ए-नोक-ए-ख़ार पैदा कर
अज़ीमुद्दीन अहमद
ग़ज़ल
'ख़ार' है जल्वा-ए-अस्नाम से दिल ख़ुल्द-ए-बरीं
या परी-ज़ादों का मजमा' है परी-ख़ाने में
ख़ार देहलवी
ग़ज़ल
क़दम ले कर कलेजे से लगाते हैं कभी उस को
कभी होते हैं हम चश्म ओ लब ओ रुख़्सार के सदक़े