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ग़ज़ल
तमाशा-गाह-ए-आलम पर्दा-दार रू-ए-ज़ेबा है
मिरी नज़रों में लेकिन ख़ुद ये पर्दा हुस्न-ए-यकता है
सय्यद बशीर हुसैन बशीर
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ग़ज़ल
अल्लाह-रे उस की चौखट है बोसा-गाह-ए-आलम
कहता है संग-ए-असवद मैं संग-ए-आस्ताँ हूँ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
नज़्म
एक सवाल
शहर आराइश-ए-जन्नत है ज़मीं पर कि नहीं
ये नुमाइश-गह-ए-तामीर-ओ-तरक़्क़ी ये ज़मीं
नियाज़ हैदर
ग़ज़ल
न कुछ आग़ाज़ होता है न कुछ अंजाम होता है
तमाशा-गाह-ए-आलम बस ख़ुदा का नाम होता है
बिशन दयाल शाद देहलवी
नज़्म
शहीद-ए-वतन
हाँ ज़रा रुक जाइए इतनी न उजलत कीजिए
इस ज़ियारत-गाह-ए-आलम की ज़ियारत कीजिए
जोश मलसियानी
ग़ज़ल
मुसलसल था फ़रेब-ए-ख़ाब-गाह-ए-आलम-ए-फ़ानी
मगर सोता रहा चलती रही उम्र-ए-रवाँ मेरी
