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ग़ज़ल
मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में
पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
उलझ पड़ते अगर तो हम में तुम में फ़र्क़ क्या रहता
यही दीवार बाक़ी थी सलामत छोड़ दी हम ने
शहज़ाद अहमद
नज़्म
जुगनू
फ़ज़ा-ए-शाम में डोरे से पड़ते जाते हैं
जिधर निगाह करें कुछ धुआँ सा उठता है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
बढ़ के रिंदों ने क़दम हज़रत-ए-वा'इज़ के लिए
गिरते पड़ते जो दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे